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Miraz- Ek Bhrm
by MS MOHIT DADA
जितनी प्यारी तेरी आखें, उतना प्यारा तेरा रूप
चितवन है ऐसा उजियारा, जैसे अंधियारे में धुप
बात लबों की आई तो गालिब भी थक कर चूर हुआ
सबने ने मानी हार कि, कैसे वर्णित हो यहाँ रूप-स्वरुप
तेरी बोली लगती जैसे, कोयल कूखे प्यारी सी
जितने सुंदर तेरा मान, उतना ही तेरा रूप-स्वरुप
तेरी पलकों कि छाया में, दिन गुज़रे फिर शाम ढले
चहूँ ओर ढूंढें हूँ तुमको, जैसे प्यासा ढूंढे कूप
बात तुम्हारी जब छेड़ी, सन्नाटा कुछ यूँ पसर गया
जैसे नदीयाँबिन पानी, और सागर बिन लहरों के चुप
जब से तेरा साथ है पाया, हमने भी ये मान लिया
कितना मुश्किल है करना, वर्णित ये तेरा रूप-स्वरुप
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